
नई दिल्ली l चीनी की कीमत बढ़ने पर सरकार बाजार को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर भी अब सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इस पूरी बहस में वह किसान कहां है, जिसके खेत से यह गन्ना निकलता है? उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
सरकार के मुताबिक 2025-26 के पेराई सत्र में 121 चीनी मिलों ने 877.96 लाख टन गन्ने की पेराई की और किसानों को अब तक ₹30,831.81 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है। सरकार इसे कुल देय राशि का 90 प्रतिशत बताती है। यानी सरकार का अपना आंकड़ा कहता है कि भुगतान का कुछ हिस्सा अभी भी बाकी है। सवाल यह नहीं कि 90 प्रतिशत भुगतान हुआ या नहीं। सवाल यह है कि बाकी 10 प्रतिशत किसका है और वह किसान कब तक इंतजार करेगा?

हापुड़ की तस्वीर और ज्यादा गंभीर सवाल खड़े करती है। जुलाई की रिपोर्ट के मुताबिक सिंभावली और ब्रजनाथपुर चीनी मिलों पर किसानों के करीब 244 रूपए करोड़ बकाया था। अप्रैल में इसी जिले से दोनों मिलों पर करीब 389 रूपए करोड़ बकाया होने की रिपोर्ट आई थी।
अलग-अलग तारीखों और स्रोतों में बकाये की रकम बदल रही है। यही बताता है कि सरकार को मिल-वार, तारीख-वार और किसान-वार भुगतान का पारदर्शी आंकड़ा सार्वजनिक करना चाहिए।
क्योंकि असली सवाल आंकड़े की कुल रकम से भी बड़ा है। जिस किसान का गन्ना मिल ने ले लिया, उसका भुगतान क्यों रुका?
किसान की फसल समय पर चाहिए। मिल को गन्ना समय पर चाहिए। चीनी बनानी है तो किसान का गन्ना चाहिए। एथेनॉल बनाना है तो भी वही गन्ना चाहिए। लेकिन भुगतान के समय व्यवस्था अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है?
और इसी बीच बाजार में चीनी महंगी हो रही है।
यहीं एथेनॉल नीति का सवाल भी जुड़ता है। यदि गन्ने का एक हिस्सा चीनी उत्पादन से हटाकर एथेनॉल की ओर जाता है तो बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। फिर चीनी की कीमत बढ़ती है। सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ता है। और अंततः उपभोक्ता ज्यादा कीमत चुकाता है। तो पूरी श्रृंखला का हिसाब होना चाहिए।
किसान को कितना मिला?
मिल को कितना मिला?
एथेनॉल में कितना गया?
चीनी कितनी उपलब्ध रही?
और उपभोक्ता ने कितनी कीमत चुकाई? किसानों की आय दोगुनी करने की बात तभी विश्वसनीय लगेगी जब किसान को उसका पैसा समय पर मिले। उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि 2017 के बाद से 3.22 लाख करोड़ रूपए से ज्यादा गन्ना मूल्य का भुगतान किया जा चुका है और 48 लाख किसान परिवार इससे लाभान्वित हुए हैं। यह बड़ा आंकड़ा है।
लेकिन बड़े आंकड़े के साथ छोटे किसान का सवाल भी बड़ा ही रहता है कि मेरे गन्ने का पैसा कब मिलेगा? यही वह सवाल है जिसे किसी सरकारी उपलब्धि के आंकड़े में दबाया नहीं जा सकता। किसान की आय बढ़ानी है तो सिर्फ गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। भुगतान में देरी रोकनी होगी, डिफॉल्टर मिलों पर कार्रवाई करनी होगी और यह भी साफ करना होगा कि एथेनॉल नीति के कारण चीनी की उपलब्धता और कीमत पर कितना असर पड़ रहा है।
वरना एक तरफ सरकार कहेगी कि किसान की आय बढ़ रही है, दूसरी तरफ किसान पूछेगा कि साहब, आय बढ़ी है तो मेरा बकाया अभी तक क्यों नहीं मिला?
यही मुद्दे की बात है।

