मुद्दे की बात :पीएम केयर्स में 8,452 करोड़, खर्च सिर्फ 87 लाख:-लेखक वरिष्ठ संपादक :-आलोक गौड़

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कोरोना के उस भयावह दौर को देश कभी भी भूल नहीं सकता, जब अस्पतालों में मरीजों के लिए जगह उपलब्ध नहीं थी, ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा हुआ था और हर परिवार किसी अनहोनी के डर के साये में जी रहा था। उसी संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी की मार्मिक अपील पर पीएम केयर्स फंड बनाया गया। देशवासियों और कंपनियों से कहा गया कि वह इस आपातकालीन फंड में अपना योगदान दें। लोगों ने उन पर भरोसा किया और हजारों करोड़ रुपये जमा हुए। लेकिन अब जब दो साल की देरी के बाद फंड का ऑडिट सामने आया है, तो राहत से ज्यादा सवाल पैदा हो रहे हैं। 31 मार्च 2025 तक पीएम केयर्स फंड में 8,452 करोड़ रुपये मौजूद थे, जबकि पूरे वित्त वर्ष में इसमें से खर्च हुए महज 87 लाख रुपये। यानी हजारों करोड़ रुपये की तिजोरी और एक साल में एक करोड़ रुपये से भी कम खर्च। दूसरी तरफ इसी अवधि में दान और जमा रकम पर ब्याज से फंड को 1,200 करोड़ रुपये से ज्यादा मिले। आखिर यह कैसा आपातकालीन फंड है, जिसमें पैसा लगातार जमा हो रहा है, ब्याज बढ़ रहा है, लेकिन खर्च नगण्य है? सवाल यह नहीं कि 8,452 करोड़ रुपये क्यों बचे। आपदा के लिए रिजर्व रखना गलत नहीं है। सवाल यह है कि उस रिजर्व के इस्तेमाल की नीति क्या है, उसका फैसला कौन करता है और जनता को उसकी जानकारी क्यों नहीं दी जाती? पीएम केयर्स की स्थापना मार्च 2020 में हुई थी। पहले शुरूआती तीन वर्षों में करीब 13,000 करोड़ रुपये जुटे और अकेले पहले सप्ताह में लगभग 3,000 करोड़ रुपये जमा हो गए। सरकार ने कंपनियों को इसमें सीएसआर के तहत योगदान की अनुमति दी। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से वेतन दान करने की अपील तक की गई। यानी पैसा जुटाने के लिए सरकार ने सार्वजनिक भरोसे और अपनी सर्वोच्च राजनीतिक संस्था की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल किया।


लेकिन जब उसी जनता ने पूछा कि पैसा कहां गया, तो जवाब मिला कि पीएम केयर्स ट्रस्ट सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है और इसलिए आरटीआई कानून के तहत जवाबदेह नहीं है।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है। जब पैसा मांगने की बारी आई तो यह देश का संकट था, प्रधानमंत्री की अपील थी और जनता का दायित्व था। लेकिन जब हिसाब मांगने की बारी आई तो यह निजी ट्रस्ट बन गया। यह विरोधाभास लोकतंत्र में आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता। अब दो साल की देरी से ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है। ऑडिट 6 अगस्त को पूरा हुआ, 7 अगस्त को दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हुए और 17 अगस्त को वेबसाइट पर अपलोड किया गया। यानी दस्तावेज सामने आ गए, लेकिन यह सवाल अपनी जगह जस का तस है कि वित्तीय विवरण सार्वजनिक करने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई? इससे भी गंभीर बात यह है कि पीएमओ ने लोकसभा सचिवालय को बताया कि पीएम केयर्स से संबंधित प्रश्न और संसद में किए जाने वाले अन्य हस्तक्षेप सदन के नियमों के तहत स्वीकार्य नहीं हैं। जिस फंड में देश की जनता और कंपनियों ने हजारों करोड़ रुपये दिए, उसके बारे में संसद में सवाल तक सीमित कर दिए जाएं l यह पारदर्शिता की कैसी व्यवस्था है? किसी भी सार्वजनिक संस्था की विश्वसनीयता उसके पास जमा रकम से नहीं, उसके हिसाब की पारदर्शिता से तय होती है। अगर सब कुछ साफ है तो जानकारी देने में डर कैसा? दानदाताओं से प्राप्त रकम, ब्याज, निवेश, खर्च और लाभार्थियों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने में आपत्ति क्यों?
अंजलि भारद्वाज समेत कई पारदर्शिता कार्यकर्ताओं ने पीएम केयर्स से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए अदालतों और सूचना आयोगों का दरवाजा खटखटाया है। चिंता इसलिए भी गंभीर है कि बड़े पैमाने पर धन के स्रोत और इस्तेमाल को सार्वजनिक जांच से बाहर रखने पर जवाबदेही कमजोर होती है और लेन-देन के बदले लाभ यानी ‘क्विड प्रो क्वो’ की आशंका पैदा होती है।
यह आरोप लगाना अलग बात है कि कोई गड़बड़ी हुई है। लेकिन लोकतंत्र का सिद्धांत यह कहता है कि ऐसी आशंका पैदा होने की गुंजाइश ही क्यों छोड़ी जाए? चुनावी बॉन्ड के मामले में भी सबसे बड़ी बहस यही थी कि धन देने वालों और धन पाने वालों के बीच पारदर्शिता कितनी होनी चाहिए। अगर पीएम केयर्स में भी बड़े योगदान और उनके इस्तेमाल को सार्वजनिक जांच से दूर रखा जाता है, तो सवाल उठेंगे ही। सरकार को चाहिए कि वह इन सवालों को राजनीतिक आरोप मानकर खारिज करने के बजाय एक झटके में खत्म करे। पीएम केयर्स की स्थापना जिस भरोसे पर हुई थी, उसी भरोसे को मजबूत करने का सबसे आसान तरीका है कि पूरा हिसाब जनता के सामने रख देना। किसने कितना दिया? कितना ब्याज मिला? कहां निवेश हुआ?
कहां कितना खर्च हुआ?
किसे लाभ मिला? और 8,452 करोड़ रुपये अभी किस रूप में रखे हैं?
इन सवालों के जवाब देश को चाहिए। क्योंकि जनता से पैसे मांगते समय भरोसा सार्वजनिक था, तो उसका हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए। मुद्दे की बात बस इतनी है कि प्रधानमंत्री के नाम पर जुटाए गए हजारों करोड़ रुपये का हिसाब जनता से छिपा नहीं रह सकता।

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