सेना के जवान के परिवार की त्रासदी की जीवंत प्रस्तुति हुई नाटक ‘ खुलल रह गइल खिड़की के एगो पाला’ में।

भारत की राजधानी दिल्ली सहित और बाइस राज्यों तथा सात कांटिनेंटल कंट्री में एक साथ आयोजित पच्चीस दिवसीय आयोजित भारत रंग महोत्सव में 18 फरवरी को “खुलल रह गइल खिड़की के एगो पाला” नाटक का मंचन मेघदूत ऑडिटोरियम, रविन्द्र भवन दिल्ली में हुआ। वरिष्ठ कहानीकार डॉ हरिसुमन बिष्ट की कहानी का राकेश कुमार द्वारा भोजपुरी में नाट्य रूपांतरण किया गया था और निर्देशन चर्चित रंग निर्देशक कुमार वीर भूषण ने किया था।

कथासार

गांव के एक निम्न वर्ग के कर्जदार जनेश्वर का परिवार है। कर्ज लेकर और पढ़ा लिखा कर बेटा नागेश्वर को फौज में भेजता है। सोचता है अब जीवन सुख का होगा। नागेश्वर की शादी आनंदी से होती है। कुछ दिन बाद सीमा पर युद्ध होता है और छुट्टी के दो दिन बाद ही नागेश्वर ड्यूटी पर लौट जाता है। फिर वह नहीं लौटता। बूढ़ी मां इंतजार के विक्षिप्त हो कर कहीं चली जाती। आनंदी पर बुरी नजर रखने वाले साहूकार कमलेश्वर और प्रधान कई बार जबरदस्ती का प्रयास करता है, छेड़छाड़ करते हैं। जागेश्वर पर बहु आनंदी से नाजायज संबंध का आरोप लगता है। इधर छुट्टी के दिन गर्भवती हुई आनंदी एक बच्चा को जन्म देती है। गांव वाले उसे नाजायज का औलाद मान दोनों को निकालने आते हैं। आनंदी सत्य के साथ अडिग रहती है, जुर्म का सामना करती है, स्त्री अस्तित्व की लड़ाई लड़ती है और सभी को बेनकाब कर भगा देती है और उस बच्चे को भी फौज में ही भेजने का संकल्प लेती है। नाटक में नारी सम्मान, देश प्रेम, युद्ध की प्रासंगिकता और मानवीय संवेदनहीनता को दिखलाती है। युद्ध के पृष्ठभूमि में युद्ध के औचित्य की भी कहानी है ‘ खुलल रह गइल खिड़की के एगो पाला ‘।

पात्र
नाटक:- खुलल रह गई खिड़की के एगो पाला

मूल आलेख:- डॉo हरि सुमन बिष्ट
रूपांतरण :- राकेश कुमार
निर्देशक :- कुमार वीर भूषण
सह निर्देशक :- अतुल ढींगरा
संगीत :- सचिन एवं समूह
प्रकाश एवं ध्वनि :- रंजीत कुमार एवं मोनीडीप कांजीलाल

ध्वनि संयोजन :- राहुल

मंच पर

आनन्दी- नम्रता (नायिका)
माई- प्रिया (मां)
जनेश्वर- राकेश (पिता)
नागेश्वर- राघव शुक्ला (नायक)
कमलेश- शशिकांत
प्रधान – अतुल ढींगरा
इन सभी ने उत्कृष्ट अभिनय किया। चरित्रों में जान फूंक दिया और दर्शकों को खूब प्रभावित किया।

डाकिया- प्रेम सिंह
लड़का – पारितोष
लड़का और डाकिया – प्रेम
लड़का- शिवम्
लड़का – राहुल राव
लड़का – शिवशंकर
औरत(1)- अनुषिका
औरत(2) – हेमलता मौर्य
औरत (3) – खुशबू कुमारी
ने भी अपने अपने चरित्रों के साथ न्याय किया। इन कलाकारों ने होली और सुमिरन में नाचना और भाव संप्रेषण में अच्छा काम किया।

संगीत निर्देशक और गायक:- सचिन कुमार का संगीत संयोजन और संगीत शैली लोकधर्मी था। शिवम , प्रिया और शशि ने स्वर दिया।
वाद्ययंत्रों पर
हारमोनियम:- सचिन कुमार
ढोलक :-वसु प्रशांत
नगाड़ा:- अतीक खान
थे

रूपसज्जा :- शर्मिला राज
वस्त्र विन्यास :- हेमलता मौर्य
अभ्यास प्रभारी :- अतुल ढींगरा
दृश्यबंध:- अतुल ढींगरा और शिवम यादव।
प्रॉपर्टी:-
प्रस्तुति :- बाबू शिवजी राय फाउंडेशन, नई दिल्ली:- 110091

विशेष आभार:- मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार।

कुमार वीर भूषण
निर्देशक
खुलल रह गइल खिड़की के एगो पाला (भोजपुरी)

युवा रंगकर्मी कुमार वीर भूषण का जन्म बिहार के वैशाली जिला में हुआ। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर, पत्रकारिता और नाट्यकला में डिप्लोमा किया। इन्हें संस्कृति मंत्रालय का रंगमंच के क्षेत्र में फेलोशिप अवार्ड मिला। इन्होंने लगभग 25 बड़े नाटकों में अभिनय किया है और बिहार तथा दिल्ली में अनेक बड़े नाटकों का निर्देशन किया जिसमें चरणदास चोर, अमली, यहूदी की लड़की, रामलीला, सैया भये कोतवाल, बकरी, बिदेसिया, रश्मिरथी, ओथेलो, सन्यासी योद्धा स्वामी विवेकानंद, वैशाली की नगरवधू अंबपाली, ध्रुवस्वामिनी, मुद्राराक्षस, बारहमासा, सवा सेर गेहूं शामिल हैं। इन्होंने भारतीय संसद के टेलीविजन ‘लोक सभा टीवी’ में बतौर प्रस्तोता और निर्माता आठ वर्ष कार्य किया।भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, संगीत नाटक अकादमी और दिल्ली सरकार के महत्वपूर्ण विभागों साहित्य कला परिषद, हिन्दी अकादमी, मैथिली और भोजपुरी अकादमी के लिए रंगमंच प्रशिक्षक और निर्देशक का कार्य किया। श्री भूषण अभी दिल्ली और बिहार में एक साथ रंगमंच और पत्रकारिता कर रहे हैं और साथ में संस्कृत नाटक “मुद्राराक्षस” पर पीएच-डी कर रहे हैं।

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