गुरु साहिब के जीवन और विचारों को इतिहास के साथ समकालीन जीवन-दृष्टि के रूप में समझने की आवश्यकता : प्रो. रमा

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हंसराज कॉलेज में ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
गुरु तेग बहादुर जी की वाणी मानवता, करुणा और निर्भय होकर सत्य के साथ खड़े होने की प्रेरणा देती है : तरणजीत सिंह सं
नई दिल्ली: गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहादत दिवस के पावन स्मरण में संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, साहित्य अकादेमी और हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आज हंसराज कॉलेज परिसर में किया गया। संगोष्ठी में दिल्ली के उपराज्यपाल श्री तरणजीत सिंह संधू की गरिमामयी उपस्थिति रही। पूरे दिन चले इस आयोजन में विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने गुरु तेग बहादुर जी की वाणी, व्यक्तित्व, शहादत तथा उनके मानवीय और सार्वभौमिक विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया।


संगोष्ठी को संबोधित करते हुए दिल्ली के उपराज्यपाल श्री तरणजीत सिंह संधू ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी की बाणी की चर्चा आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पटना साहिब से शुरू हुई गुरु साहिब की यात्रा आज जन-जन तक पहुंच चुकी है और उनकी वाणी के प्रति समाज में गहरी निष्ठा और श्रद्धा है। गुरु साहिब की वाणी मनुष्य को भय से मुक्ति, करुणा और प्रकाश का संदेश देती है तथा सत्य के साथ खड़े होने, अपने मूल्यों की रक्षा करने और दूसरों के अधिकारों एवं सम्मान के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान भारत के इतिहास में सर्वोच्च मानवीय और नैतिक बलिदानों में से एक है। उनका जीवन सत्य, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर सर्वोच्च बलिदान देने की प्रेरणा देता है।


श्री संधू ने युवाओं का आह्वान किया कि वे गुरु साहिब की बाणी को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि उसके संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करें। उन्होंने ‘चढ़दी कला’ को निरंतर उत्साह, साहस और आगे बढ़ने की भावना से जोड़ते हुए कहा कि गुरु साहिब सभी मनुष्यों के सम्मान और समानता का संदेश देते हैं। जाति-पाति से ऊपर उठकर प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान की भावना उनके विचारों में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना भी गुरु साहिब के संदेश से गहराई से जुड़ती है। श्री संधू ने अमृतसर स्थित गुरु का बाग और 1921 के गुरु का बाग आंदोलन का उल्लेख करते हुए इसे मूल्यों और अधिकारों की रक्षा के संघर्ष की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मृति बताया। उन्होंने रुचि राम साहनी की पुस्तक का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय मानवता के इतिहास में गुरु तेग बहादुर जी का ‘हिंद की चादर’ के रूप में स्मरण किया जाना गौरव का विषय है। उन्होंने युवाओं से अपनी ऊर्जा देश, समाज और मानवता के निर्माण में लगाने का आह्वान किया।
प्रो. रमा ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी के व्यक्तित्व में धर्म केवल आस्था का विषय नहीं था, बल्कि मूल्यों और मानवीय सम्मान के लिए खड़े होने का साहस भी था। उन्होंने कहा कि गुरु साहिब को केवल इतिहास के एक अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत विचार और जीवन-दृष्टि के रूप में पढ़ने की आवश्यकता है। सत्य के लिए खड़ा होना और स्वतंत्र चिंतन करना भी स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण स्वरूप है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की शक्ति को उसकी विविधता में निहित बताते हुए कहा कि गुरु साहिब का जीवन सहिष्णुता, सम्मान और मानवीय गरिमा के मूल्यों को सामने लाता है। उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी के साथ-साथ बाल शहीदों के साहस और बलिदान का स्मरण करते हुए कहा कि शहीदों द्वारा स्थापित मूल्य आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। उन्होंने हंसराज कॉलेज और दिल्ली के लिए गुरु साहिब के जीवन एवं विचारों पर इस प्रकार के गंभीर विमर्श को गौरव का विषय बताया।


साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी ने अपने लिए नहीं, बल्कि देश, धर्म और मानवता के व्यापक हित के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने कहा कि साहित्य अकादेमी की यह पहल गुरु साहिब के प्रति ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ऋण को स्मरण करने का एक विनम्र प्रयास है। उन्होंने कहा कि गुरु साहिब की बाणी में व्यापक मानवीय ज्ञान और अनुभव समाहित है। मानव अधिकारों की रक्षा और ‘सरबत का भला’ एक ही व्यापक मानवीय विचारधारा के दो पक्ष हैं। उन्होंने ‘निर्भउ, निरवैर’ के विचार को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि गुरु साहिब की वाणी मनुष्य को भय और वैर से मुक्त होकर जीवन जीने की प्रेरणा देती है। श्री कौशिक ने गुरु साहिब की मीरी-पीरी की अवधारणा और राग जयजयवंती का उल्लेख करते हुए उनकी बाणी को भारतीय आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा की अमूल्य धरोहर बताया।
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में गुरु नानक देव जी से गुरु तेग बहादुर जी तक की सिख चिंतन-परंपरा पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने गुरु साहिब की बाणी, साहित्यिक एवं आध्यात्मिक चिंतन, जीवन-मूल्यों और बलिदान के विभिन्न आयामों को समकालीन संदर्भों से जोड़कर देखा। धर्म की अवधारणा, मानवीय स्वतंत्रता, निर्भयता, करुणा, समानता, सत्य, स्वतंत्र चिंतन और मानवीय गरिमा जैसे विषय विमर्श के केंद्र में रहे। गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान को आस्था, मूल्यों, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों की रक्षा के व्यापक संदर्भ में समझने पर भी विचार हुआ।
हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के उपाध्यक्ष श्री कुलदीप सिंह अग्निहोत्री ने ‘संवाद से भारतीयता की स्थापना’ के विचार पर प्रकाश डालते हुए भारतीय परंपरा में संवाद, विविधता और विभिन्न विचार-परंपराओं के सह-अस्तित्व के महत्व को रेखांकित किया। सत्रों में सिख इतिहास में बंजारा समाज की भूमिका पर भी चर्चा हुई, जिससे इस ऐतिहासिक परंपरा के सामाजिक आयाम सामने आए।
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के कुलपति प्रो. जगबीर सिंह ने विमर्श को समकालीन भारत के संदर्भ से जोड़ते हुए गुरु तेग बहादुर जी की बाणी को भारतीय ऋषि परंपरा से जोड़ा। उन्होंने बाणी में निहित मनुष्य, सत्य, आत्मबोध और लोककल्याण से जुड़े मूल्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने सनातन और सिख परंपराओं को दो अलग-अलग धाराओं के बजाय साझा भारतीय मूल्य-परंपरा से सिंचित मूल्य-व्यवस्थाओं के रूप में समझने की आवश्यकता पर बल दिया और भारतीय चिंतन की निरंतरता को रेखांकित किया।
संगोष्ठी के अन्य सत्रों में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री वीरेंद्र पाल, प्रसिद्ध पंजाबी लेखक श्री रविंदर सिंह, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के कुलपति प्रो. जगबीर सिंह, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के उपाध्यक्ष श्री कुलदीप सिंह अग्निहोत्री, साहित्य अकादेमी के पंजाबी परामर्श मंडल की संयोजक सुश्री श्वेता सिंह तथा साहित्य अकादेमी के उपसचिव श्री नवीन कुमार सहित अनेक विद्वान, साहित्यकार और शिक्षाविद उपस्थित रहे। विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने गुरु तेग बहादुर जी की वाणी, उनके साहित्यिक एवं आध्यात्मिक चिंतन तथा मानवीय मूल्यों पर अपने विचार साझा किए।
पूरे दिन चले इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में सभी सत्रों का केंद्र गुरु तेग बहादुर जी की बाणी और उसका मानवीय संदेश रहा। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि गुरु साहिब की बाणी और जीवन-दर्शन किसी एक कालखंड या समुदाय तक सीमित नहीं हैं। निर्भयता, करुणा, समानता, स्वतंत्र चिंतन, मानव गरिमा, सत्य और सर्वकल्याण जैसे उनके संदेश आज भी प्रासंगिक हैं। संगोष्ठी ने गुरु तेग बहादुर जी की वाणी को साहित्य, अध्यात्म, इतिहास और समकालीन सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए एक व्यापक विमर्श का अवसर प्रदान किया।

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