
प्रो. रवि टेकचंदानी (चेयरमैन, CIPS, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने मुहम्मद बिन कासिम, 1905 के बंगाल विभाजन और सिंधु घाटी सभ्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “गुलामी की मानसिकता से मुक्ति’ वाले कथन को उद्धृत किया।

महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. नीलम राठी ने अपने संबोधन में संगोष्ठी की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विभिन्न व्यक्तियों के सहयोग और प्रयासों से यह सेमिनार संभव हो सका। उन्होंने नरेंद्र मोहन के नाटकों के संदर्भ में भारत विभाजन के सामाजिक-ऐतिहासिक आयामों पर चर्चा की। बंग-भंग के प्रसंग को उठाते हुए उन्होंने बताया कि 1911 के आसपास समुदायों के बीच दरारें उभरने लगीं। उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ में राजनीतिक और व्यापारिक हितों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। अंत में उन्होंने कहा कि विभाजन को केवल त्रासदी नहीं बल्कि उससे लाभान्वित शक्तियों के संदर्भ में भी समझना आवश्यक है।


गोष्ठी में विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से आई छात्राओं शोधार्थियों और प्राध्यापकों ने विभाजन के सामाजिक, साहित्यिक व ऐतिहासिक आयामों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। विशेष रूप से महिलाओं के अनुभवों और संघर्षों पर गंभीर विमर्श हुआ। लेडी श्रीराम कॉलेज खालसा कॉलेज, हिंदू कॉलेज, माता सुंदरी, मीरांडा हाउस, कालिंदी कॉलेज सहित दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और देश के विभिन्न राज्यों से प्रतिभागियों ने सहभागिता की। पेपर प्रेजेंटेशन सत्र में लगभग 50 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। तीन दिवसीय संगोष्ठी ने अकादमिक संवाद को समृद्ध करते हुए विभाजन विषय पर सार्थक चर्चा का मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम का समापन प्रो. सुनीता बहमनी के धन्मवाद ज्ञापन से हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं छात्राओं के प्रति आभार प्रकट करते हुए इस तीन दिवसीय संगोष्ठी को सफल बनाने में उनके योगदान को रेखांकित किया।
शोध पत्र प्रतियोगिता के परिणाम इस प्रकार रहे प्रथम स्थान सुहानी कुमारी एवं फोजिया अली (अदिति महाविद्यालय) ने प्राप्त किया। द्वितीय स्थान मानसी सिंह (श्री गुरु तेग बहादुर खालसा महाविद्यालय) को मिला जबकि तृतीय स्थान दीपिका साहू एवं पी. वर्धा (अदिति महाविद्यालय) ने हासिल किया। सांत्खना पुरस्कार सीजल कौर (लेडी श्रीराम कॉलेज) को प्रदान किया गया।

