
- कई अस्पतालों के निर्माण कार्य टप, आर्थिक तंगी है वजह
जीपी तिवारी
नई दिल्ली l
दिल्ली में स्वास्थ्य अवसंरचना की स्थिति अब गंभीर प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक उदासीनता का प्रतीक बनती जा रही है, जिसकी तुलना स्वाभाविक रूप से कश्मीर के अवंतिपुरा स्थित एम्स (AIIMS Avantipura) से की जा सकती है, जहाँ एक राष्ट्रीय महत्व की स्वास्थ्य परियोजना पिछले दस वर्षों से निर्माणाधीन है और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तथा आपसी खींचतान के कारण आज भी अधूरी पड़ी है, जिसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम गरीब और जरूरतमंद जनता को भुगतना पड़ रहा है। दुर्भाग्यवश, दिल्ली में भी ठीक वैसी ही स्थिति उभर चुकी है, जहाँ 2017 से 2021 के बीच शुरू किए गए कई प्रमुख अस्पताल—एलएनजेपी अस्पताल विस्तार, सिरसपुर 7-आईसीयू अस्पताल, राव तुला अस्पताल, एलबीएस अस्पताल, मधिपुर अस्पताल, ज्वालापुरी अस्पताल, किचिरिपुर अस्पताल, हस्तसाल अस्पताल, आरटीआरएम अस्पताल, मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल, आईसीयू कोविड अस्पताल सहित अन्य परियोजनाएं—पिछले 6 से 8 वर्षों से अधूरी पड़ी हैं। इन परियोजनाओं में 40 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक निर्माण कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और हजारों करोड़ रुपये का सार्वजनिक धन खर्च हो चुका है, इसके बावजूद पिछले लगभग एक वर्ष से सभी निर्माण कार्य ठप पड़े हैं, जिससे बने-बनाए ढांचे जर्जर हो रहे हैं और सार्वजनिक निवेश का मूल्य दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है।
स्थिति को और अधिक गंभीर बनाता है सरकार का यह प्रस्ताव कि इन अधूरे अस्पतालों के मौजूदा ठेकों को फोरक्लोज़ कर पुनः टेंडर जारी किए जाएं, जबकि यह सर्वविदित है कि ऐसी किसी भी कार्रवाई से कम से कम 4–5 वर्षों की अतिरिक्त देरी, निर्माण लागत में भारी वृद्धि, तथा सरकारी खजाने पर अरबों रुपये का अनावश्यक बोझ पड़ेगा। इतना ही नहीं, बिना ठेकेदार की गलती के अनुबंध समाप्त करने से बड़े पैमाने पर मध्यस्थता (Arbitration) और न्यायिक विवाद खड़े होने की पूरी संभावना है, जिनमें ठेकेदार समय-वृद्धि, निष्क्रिय संसाधनों, मूल्य-वृद्धि, ओवरहेड्स और लाभ-हानि के दावे करेंगे, और अंततः इन सभी मामलों में भी भुगतान जनता के धन से ही किया जाएगा। यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि एक ओर एलएनजेपी जैसे प्रमुख सरकारी अस्पताल पहले से ही अत्यधिक भीड़, बेड और आईसीयू की भारी कमी से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी अस्पताल के विस्तार सहित अनेक नई स्वास्थ्य परियोजनाएं जानबूझकर अधर में लटकाई जा रही हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन अधूरे अस्पतालों की बदहाल स्थिति को तत्काल जनस्वास्थ्य संकट के रूप में देखने के बजाय राजनीतिक लाभ-हानि का साधन बना दिया गया है, जबकि वास्तविक कीमत आम नागरिक चुका रहा है—कभी इलाज में देरी के रूप में, कभी अस्पताल में जगह न मिलने के रूप में, और कभी जान गंवाने के रूप में। यदि समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो दिल्ली के ये अस्पताल भी अवंतिपुरा एम्स की तरह देरी, विवाद और जनहानि के स्थायी उदाहरण बन जाएंगे। अतः यह अनिवार्य हो गया है कि सरकार राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर तत्काल हस्तक्षेप करे, मौजूदा ठेकों के तहत कार्य पुनः आरंभ कराए और समयबद्ध रूप से इन अस्पतालों को पूरा करे, क्योंकि स्वास्थ्य अवसंरचना में देरी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जनता के जीवन के साथ किया गया अन्याय है।

