
MSMEs/SMEs को मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री से तुरंत दखल देने की मांग
नई दिल्ली (संवाददाता-बंसी लाल ) ।
एपेक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ एनसीटी दिल्ली जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की 65 से ज्यादा प्रमुख इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन और हजारों MSMEs को रिप्रेजेंट करता है ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को पत्र लिखकर लघु एवं मध्यम उद्योगों की समस्याओं की ओर उनका ध्यान केन्द्रित किया है। पत्र की प्रतियां दिल्ली के उद्योग मंत्री मनजिन्दर सिंह सिरसा, एडीशनल चीफ सैक्रेटरी (इंडस्ट्रीज) बिपुल पाठक और मैनेजिंग डायरेक्टर डीएसआईआईडीसी सुश्री नाजुक कुमार को भी भेजी गई है।।
एपेक्स चैम्बर के अध्यक्ष कपिल चोपड़ा, उपाध्यक्ष रघुवंश अरोड़ा एवं जनरल सैक्रेटरी सुनील चड्ढा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर दिल्ली के इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम, खासकर माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) और SMEs को बुरी तरह प्रभावित करने वाले कई लंबे समय से पेंडिंग मुद्दों पर उनके दखल की मांग ही है। उन्होंने कहा कि MSMEs /SMEs दिल्ली की इकॉनमी की रीढ़ हैं और रोजगार पैदा करने में सबसे बड़े योगदान देने वालों में से हैं। पत्र में उन्होंने इंडस्ट्रियल रेगुलेशन में ढील देने और इंडस्ट्री से जुड़े मुद्दों के प्रोएक्टिव समाधान के बारे में मुख्यमंत्री के आश्वासन की सराहना की। उन्होंने पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री से निम्न समस्याओं के समाधान की मांग की जिनके कारण उद्योगों में निवेश बनाए रखने और रोजगार के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा हो रही हैं-
फ्रीहोल्ड और कन्वर्जन चार्ज
फ्रीहोल्ड कन्वर्जन दिल्ली के इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए एक लंबे समय से पेंडिंग और जरूरी मुद्दा बना हुआ है। नॉन-फ्रीहोल्ड स्टेटस और ज्यादा कन्वर्जन चार्ज इन्वेस्टमेंट, रीडेवलपमेंट और टेक्नोलॉजिकल अपग्रेडेशन में रुकावट डालते रहते हैं। इस बारे में कोर्ट के स्प” फैसलों और एपेक्स चैम्बर के बार-बार अनुरोध के बावजूद, इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री से मांग की गई कि दिल्ली में सभी इंडस्ट्रियल प्लॉट/शेड को फ्रीहोल्ड स्टेटस दिया जाए। कन्वर्जन चार्ज कम करें और कन्वर्जन प्रोसेस को आसान बनाएं। मिक्स्ड-यूज रीडेवलपमेंट के लिए हर फ्रलोर पर कन्वर्जन की इजाजत दें, जिससे बिना किसी पेनल्टी कॉस्ट के वर्टिकल एक्सपेंशन हो सके। मॉडर्न मैन्युफैक्चरिंग/वेयरहाउस अपग्रेड के लिए जरूरी मौजूदा जमीन का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए मंजूर थ्।त् (फ्रलोर एरिया रेश्यो) बढ़ाएं।
महंगी बिजली
इसके अलावा अधिक बिजली टैरिफ का मामला भी संज्ञान में लाया गया। दिल्ली के इंडस्ट्रियल बिजली टैरिफ देश में सबसे ज्यादा हैं, क्योंकि PPAC, 8% सरचार्ज, 7% पेंशन फंड और 5% इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी जैसे कई एक्स्ट्रा लेवी हैं, जिनसे कुल मिलाकर लागत काफी बढ़ जाती है। इन्हें सही करने की जरूरत है। DISCOMs दिल्ली में हर इंडस्ट्रियल यूनिट से 5% इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी इकट्टा करती हैं, जिससे इंडस्ट्रियल इलाकों में बेसिक नागरिक सुविधाएं, जिसमें सही और चालू स्ट्रीट लाइटिंग शामिल है, दी जाती हैं। हालांकि, कई इंडस्ट्रियल इलाकों में, स्ट्रीट लाइटें या तो गायब हैं या काम नहीं करती हैं, जिससे गंभीर सेफ्रटी और सिक्योरिटी की चिंताएं होती हैं, खासकर रात में ऑपरेशन और सामान की आवाजाही के दौरान। इस ड्यूटी के धन को इंडस्ट्रियल इलाकों के इलेक्ट्रिफिकेशन और मेंटेनेंस के लिए खर्च करना सुनिश्चित किया जाए।
पेयजल की कमी
दिल्ली के ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रें में रेगुलर और पीने लायक पानी की सुविधाओं की कमी बनी हुई है। जहां पानी के कनेक्शन हैं भी, वहां टैरिफ बहुत ज्यादा हैं, जिससे इंडस्ट्रीज को बहुत ज्यादा कीमत पर प्राइवेट पानी के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। एपेक्स चैंबर के बार-बार कहने के बावजूद अब तक कोई स्ट्रक्चर्ड या टाइम-बाउंड सॉल्यूशन लागू नहीं किया गया है। एपेक्स चैम्बर का सुझाव है कि इंडस्ट्री के हिसाब से पानी के टैरिफ पड़ोसी राज्यों (हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब) के हिसाब से हों। हर इंडस्ट्रियल एस्टेट में पाइप से पीने के पानी का सिस्टम लगाना जरूरी हो।
वॉटर लॉगिंग, ड्रेनेज और सीवर मेंटेनेंस में खराबी
कई इंडस्ट्रियल एरिया में लगातार वॉटर लॉगिंग अब सिर्फ मॉनसून तक ही सीमित नहीं है और अक्सर कई दिनों तक बनी रहती है। बंद नालियों और बार-बार सीवर ओवरफ्रलो होने से अंदर की सड़कों पर सीवेज का गंदा पानी जमा हो जाता है, जिस पर बार-बार शिकायत करने के बाद भी कई दिनों तक ध्यान नहीं दिया जाता। लगातार इस स्थिति की वजह से सेहत को गंभीर खतरा, फैलने वाली बीमारियाँ, इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर को बार-बार नुकसान, और प्रोडक्शन में काफी नुकसान हुआ है, जिसका मुख्य कारण संबंधित सिविक एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी है। एपेक्स चैम्बर की मांग है कि इंडस्ट्रियल एरिया के लिए जोन के हिसाब से ड्रेनेज और सीवर अपग्रेडेशन प्लान साफ टाइमलाइन के साथ तैयार करें। सीवर, स्टॉर्मवॉटर और ड्रेन के मेंटेनेंस के लिए एक नोडल एजेंसी की जवाबदेही तय करें।
पड़ोसी राज्यों से ज्यादा मिनिमम वेज
अनस्किल्ड लेबर/वर्कर्स के लिए दिल्ली का मिनिमम वेज भारत में सबसे ज्यादा है, इससे MSMEs/SMEs के लिए ऑपरेशनल कॉस्ट काफी बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए हरियाणा में 11,257/- रुपए मासिक, उत्तर प्रदेश 10,701/-, पंजाब 10,996/-, राजस्थान 7,410/- रुपए जबकि दिल्ली में यह 18,456/- रुपए है। एपेक्स चैम्बर ने सुझाव दिया कि माइक्रो और स्मॉल यूनिट्स के लिए इंडस्ट्री-स्पेसिफिक लेबर रेट या छूट/सब्सिडी शुरू करें तथा छोटी इंडस्ट्रियल यूनिट्स के लिए अलग-अलग या कम सैलरी स्लैब पर विचार करें।
सड़कों की खराब हालत
इंडस्ट्रियल एरिया में रेगुलर मेंटेनेंस की पूरी कमी है, सड़कों पर कई दिनों तक कचरा और वेस्ट पड़ा रहता है। अंदर की और आने-जाने वाली सड़कें बुरी तरह खराब हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन और सेफ्टी के लिए गंभीर खतरा पैदा होता है। जहाँ बार-बार शिकायत के बाद सीवर की सफाई की भी जाती है, वहाँ निकाला गया कीचड़ और जहरीला वेस्ट कई दिनों तक सड़कों पर खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे हालत और खराब हो जाती है। सरकार इस ओर ध्यान दे। लोकल बॉडीज के जरिए रेगुलर सफाई और सड़क इंस्पेक्शन के तरीके लागू करें। इसके अलावा CETPs, वेस्ट मैनेजमेंट और पॉल्यूशन कंट्रोल सुविधाओं जैसे कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशन डेवलप करें।
नोटिफाइड इंडस्ट्रियल एरिया का लंबे समय से रुका हुआ रीडेवलपमेंट एक दशक से ज्यादा समय बाद भी आगे नहीं बढ़ा है। स्टेकहोल्डर से सलाह लेकर DPRs को प्रायोरिटी पर फाइनल और अप्रूव करें। फ्रीहोल्ड कन्वर्जन और दूसरे इंडस्ट्रियल रेवेन्यू से मिले फंड का इस्तेमाल खास तौर पर रीडेवलपमेंट के कामों के लिए करें।
इंटरेक्शन मीटिंग के लिए रिक्वेस्ट
एपेक्स चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के पदाधिकारियों ने इन सभी समस्याओं पर चर्चा के लिए मुख्यमंत्री से चैम्बर के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक करने की मांग की जिसमें सभी सम्बन्धित मंत्री व अधिकारी परवेश वर्मा (PWD और जल मंत्री), आशीष सूद (बिजली मंत्री), बिपुल पाठक IAS (ACS इंडस्ट्रीज), सुश्री नाजुक कुमार IAS (MD, DSIIDC) और राजा इकबाल सिंह (मेयर-MCD) शामिल हों ताकि इन समस्याओं के समाधान के लिए सार्थक चर्चा हो सके।

