अदिति महाविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन वक्ताओं ने रखे गहरे विचार

विभाजन पर अभी लिखा जाना बाकी है

नई दिल्ली, 25 फरवरी 2026 अदिति महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्यावधान में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारत विभाजन की साहित्यिक अभिव्यक्ति” के दूसरे दिबुधवार को विचारों का सरगम बंधा। आईसीएसएसआर द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी में देश के जाने-माने विद्वानों ने विभाजन की उस पीड़ा को शब्द दिए।

कार्यक्रम की शुरुआत सुबह सरस्वती वंदना और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुईशूनम मटिया ने अपनी कविता “भारत की लोक मंगल, साधना साकार हो से माहौल को और संगीतमय बना दिया महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. नीलम राठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कल के कार्यक्रम की झलकियाँ साझा कीं और आज के सत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की।

इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय (कुलपति, बाबासाहेब आंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी, कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने कहा, “जिस देश के आकाश में शांति के बादलों का मेला बजता था, वहीं आज भी विभाजन की त्रासदी हमें सोचने पर मजबूर करती है।” उन्होंने 1905 के बंगभंग से लेकर 1971 के मुक्ति युद्ध तक के इतिहास को रेखांकित किया और बताया कि कैसे विभाजन ने महिलाओं को दोहरे शोषण का शिकार बनाया। आयशा जलाल की पंक्तियों के साथ उन्होंने अपने वक्तव्य को विराम दिया।

वहीं प्रो. मज़हर आसिफ़ (कुलपति, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय) ने अपने उद्बोधन में भाषा, बोली और संस्कृति के अंतर को समझाते हुए कहा कि इक़बाल की शायरी बंटवारे के पहले और बाद में कैसे बदल गई, यह अपने आप में एक शोध है। उन्होंने अमीर खुसरो से लेकर राजेंद्र सिंह बेदी की कहानियों और ‘खोल दो’ जैसी मार्मिक रचनाओं का जिक्र किया। “दिल से साबित करो कि तुम जिंदा हो, सिर्फ सांस लेना जरूरी नहीं” अली सरदार जाफरी की इस पंक्ति के साथ उन्होंने अपनी बालखत्म की।

विचारों की इस श्रृखला में एक और नाम जुड़ा प्रो. महेशचंद शर्मा (अध्यक्ष, एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास संस्थान का । उन्होंने कहा कि “विभाजन पर अभी लिखा जाना बाकी है, अभी वह पूरी तरह सामने नहीं आया।” उन्होंने 1909 के पृथक इलेक्ट्रोल से लेकर मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट तक का सफर दिखाया। गाँधी की विफलता पर शोध की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि जब तक हम पाकिस्तान और भारत की मान्यताओं से बाहर नहीं निकलेंगे, यह बंटवारा मानसिक रूप से खत्म नहीं होगा।

श्री श्रीधर पराड़कर (साहित्यकार एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संरक्षक ने भारत विभाजन को केवल ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि गहरी मानवीय त्रासदी के रूप में प्रस्तुत किया। साथ ही “ज्योति जला निज प्राण की”, “देश बॉट गया” और “विभाजित” जैसी पुस्तकों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि साहित्य विभाजन की सच्चाइयों और मानवीय संवेदनाओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इन्होंने विशेष रूप सेमहिलाओं के संघर्ष और सामाजिक प्रभावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसी कृतियाँ नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ती हैं इसलिये इतिहास को पढ़ना और समझना जरूरी है

साहित्य परिक्रमा के संपादक इंदू शेखर तत्पुरुष, इम्मू के प्रो नरेंद्र मिश्र, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के विभिन्न पदाधिकारी, अदिति महाविद्यालय के शिक्षक एवं छात्रगण देख के विभिन्न भागो से आए शोधार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। प्रांत कार्यवाहक दिल्ली प्रदेश अनिल गुप्ता ने विभाजन के बारे में विभाजन की त्रासदी, पीड़ा और स्मयं सेवकों के योगदान के बारे में और भविष्य की भावी पीढ़ी को बताया कि इन सभी चीजों के गहन अध्ययन की अति आवश्यकता है।

वरिष्ठ साहित्यकार रतन चंद्र सरदानाने कहा कि वह उस त्रासदी को महसूस करने भोगने तथा देखने वाले में से एकहूं। विभाजन के समय वह 7 वर्ष के थे। उन्होंने अपने आपबीती से जोड़ते हुए विभाजन को याद किया और भविष्य की युवा पीढ़ी को संदेश दिया कि भविष्य में सजग और सतर्क रहें ताकि की भारत को दोबारा ऐसा विभीषण त्रासदी को देखना ना पड़े।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. सुनीता बहमनी ने सभी अतिथियों, शिक्षकों और छात्राओं का आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी का तीसरा और अंतिम दिन कल यानी 26 फरवरी को आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभाजन पर और गहन चर्चा होगी।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top